ऋग्वेद (मंडल 1)
अस॑र्जि वां॒ स्थवि॑रा वेधसा॒ गीर्बा॒ळ्हे अ॑श्विना त्रे॒धा क्षर॑न्ती । उप॑स्तुताववतं॒ नाध॑मानं॒ याम॒न्नया॑मञ्छृणुतं॒ हवं॑ मे ॥ (७)
हे विधाता अश्विनीकुमारो! तुम्हें दृढ़ बनाने के लिए अत्यंत उत्तम स्तुतियां बनाई गई हैं. वे तीन प्रकार से तुम्हारे पास पहुंचती है. तुम स्तुति सुनकर अभीष्ट फल चाहने वाले यजमान की रक्षा करो एवं जाते हुए अथवा खड़े होकर उसकी पुकार सुनो. (७)
O Vidhata Ashwinikumaro! The best praises have been made to make you firm. They reach you in three ways. When you hear the praise, protect the host who wants the desired fruit and listen to his call as you go or stand up. (7)