ऋग्वेद (मंडल 1)
उ॒र्वी सद्म॑नी बृह॒ती ऋ॒तेन॑ हु॒वे दे॒वाना॒मव॑सा॒ जनि॑त्री । द॒धाते॒ ये अ॒मृतं॑ सु॒प्रती॑के॒ द्यावा॒ रक्ष॑तं पृथिवी नो॒ अभ्वा॑त् ॥ (६)
धरती और आकाश विस्तृत, निवास करने योग्य, महान् एवं शस्य आदि को उत्पन्न करने वाले हैं. मैं देवों की प्रसन्नता के लिए इन्हें यज्ञ में बुलाता हूं. ये विचित्र रूप वाले एवं जल धारणकर्तता हैं. हे धरती और आकाश! हमें पाप से बचाओ. (६)
The earth and the sky are vast, habitable, great and producing the culture, etc. I call them to the yagna for the pleasure of the gods. These are peculiar in appearance and water retention. O earth and sky! Save us from sin. (6)