ऋग्वेद (मंडल 1)
आ नो॒ विश्व॒ आस्क्रा॑ गमन्तु दे॒वा मि॒त्रो अ॑र्य॒मा वरु॑णः स॒जोषाः॑ । भुव॒न्यथा॑ नो॒ विश्वे॑ वृ॒धासः॒ कर॑न्सु॒षाहा॑ विथु॒रं न शवः॑ ॥ (२)
शत्रुओं पर आक्रमण करने वाले मित्र, वरुण और अर्यमादेव समान प्रसन्नता द्वारा हमारे यज्ञ में पधारें. सब देव हमारी वृद्धि करें, शत्रुओं को हरावें एवं हमें अन्न का स्वामी बनावें. (२)
May the friends who attack the enemies, Varuna and Aryamadeva, come to our yagna with equal joy. May all the gods increase us, defeat the enemies and make us masters of food. (2)