ऋग्वेद (मंडल 1)
सु॒प्रैतुः॑ सू॒यव॑सो॒ न पन्था॑ दुर्नि॒यन्तुः॒ परि॑प्रीतो॒ न मि॒त्रः । अ॒न॒र्वाणो॑ अ॒भि ये चक्ष॑ते॒ नोऽपी॑वृता अपोर्णु॒वन्तो॑ अस्थुः ॥ (६)
हे बृहस्पति! तुम शोभन मार्ग वाले एवं उत्तम धन से युक्त यजमान के लिए मार्ग के समान सरल एवं दुष्टों के नियंत्रण करने वाले राजा के प्रसन्न मित्र बनो. जो विरोधी हमारी निंदा करते हैं और सुरक्षित रहते हैं, उन्हें रक्षाहीन करो. (६)
O Jupiter! Be a happy friend of the king, who controls the wicked and as simple as the way for a host with good wealth and with good wealth. Those who condemn us and remain safe, make them defenseless. (6)