हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.191.12

मंडल 1 → सूक्त 191 → श्लोक 12 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 191
त्रिः स॒प्त वि॑ष्पुलिङ्ग॒का वि॒षस्य॒ पुष्य॑मक्षन् । ताश्चि॒न्नु न म॑रन्ति॒ नो व॒यं म॑रामा॒रे अ॑स्य॒ योज॑नं हरि॒ष्ठा मधु॑ त्वा मधु॒ला च॑कार ॥ (१२)
अग्नि की सातों जिह्लाओं में सफेद, लाल और काले इस प्रकार मिलकर इक्कीस वर्ण पक्षी के रूप में विष का नाश करते हैं. जब वे नहीं मरते तो हम भी नहीं मरेंगे. अपने घोड़ों द्वारा गमनशील सूर्य दूर रखे विष का नाश करते हैं. हे विष! सूर्य की मधुविद्या तुझे अमृत बना देती है. (१२)
In the seven tongues of fire, white, red and black thus together the twenty-one characters destroy the poison in the form of birds. When they don't die, we won't die either. The sun moving by your horses destroy the poison kept away. Oh poison! The honey of the sun makes you nectar. (12)