हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 30
आ व॒ इन्द्रं॒ क्रिविं॑ यथा वाज॒यन्तः॑ श॒तक्र॑तुम् । मंहि॑ष्ठं सिञ्च॒ इन्दु॑भिः ॥ (१)
हे यजमानो एवं ऋत्विजो! जिस प्रकार कुएं को जल से भर देते हैं, उसी प्रकार हम अन्न की इच्छा से हजार यज्ञ करने वाले एवं महान्‌ इंद्र को सोमरस से सींच देते हैं. (१)
O hosts and ritwijo! Just as we fill the well with water, so we water a thousand yajnas and the great Indra with somras, who perform a thousand yagnas, desiring food. (1)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 30
श॒तं वा॒ यः शुची॑नां स॒हस्रं॑ वा॒ समा॑शिराम् । एदु॑ नि॒म्नं न री॑यते ॥ (२)
जिस प्रकार पानी अपने आप नीचे की ओर बहता है, उसी प्रकार इंद्र सैकड़ों संख्या वाले विशुद्ध सोमरस एवं हजारों संख्या वाले आशीर मिश्रित सोमरस के समीप आते हैं. (२)
Just as the water flows downwards on its own, Indra comes close to the pure Somras of hundreds and the ashir mixed someras of thousands. (2)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 30
सं यन्मदा॑य शु॒ष्मिण॑ ए॒ना ह्य॑स्यो॒दरे॑ । स॒मु॒द्रो न व्यचो॑ द॒धे ॥ (३)
पहले बताया हुआ सोमरस बलशाली इंद्र को प्रसन्न करने के लिए एकत्रित हुआ है. इसके द्वारा इंद्र का सागर के समान विस्तृत उदर भर जाता है. (३)
The somras mentioned earlier have gathered to please the mighty Indra. Through this, Indra's wide abdomen is filled like the ocean. (3)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 30
अ॒यमु॑ ते॒ सम॑तसि क॒पोत॑ इव गर्भ॒धिम् । वच॒स्तच्चि॑न्न ओहसे ॥ (४)
हे इंद्र! जिस प्रकार कबूतर गर्भ धारण करने की इच्छुक कबूतरी को प्राप्त करता है, उसी प्रकार तुम अपने इस सोमरस को ग्रहण करो. इसी सोमरस के कारण हमारी प्रार्थनाएं भी स्वीकार करो. (४)
O Indra! Just as the dove receives the dove willing to conceive, so you receive this somras of yours. Also accept our prayers because of this somras. (4)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 30
स्तो॒त्रं रा॑धानां पते॒ गिर्वा॑हो वीर॒ यस्य॑ ते । विभू॑तिरस्तु सू॒नृता॑ ॥ (५)
हे धन के रक्षक एवं उत्तम वचनों द्वारा स्तुति किए गए वीर इंद्र! हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. यह स्तुति तुम्हारी विभूति से संपन्न एवं सत्य हो. (५)
O brave Indra, the protector of wealth and praised by the best words! We praise you. May this praise be endowed with your personality and be true. (5)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 30
ऊ॒र्ध्वस्ति॑ष्ठा न ऊ॒तये॒ऽस्मिन्वाजे॑ शतक्रतो । सम॒न्येषु॑ ब्रवावहै ॥ (६)
हे सौ यज्ञ करने वाले इंद्र! इस संग्राम में हमारी रक्षा करने के लिए तत्पर रहो. दूसरे कार्यो के विषय में हम और तुम मिलकर बातचीत करेंगे. (६)
O Indra, who performs a hundred sacrifices! Look forward to protecting us in this battle. We and you will talk together about other tasks. (6)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 30
योगे॑योगे त॒वस्त॑रं॒ वाजे॑वाजे हवामहे । सखा॑य॒ इन्द्र॑मू॒तये॑ ॥ (७)
हम प्रत्येक यज्ञ के आरंभ में एवं अपने यज्ञों में विघ्न डालने वाले विभिन्न संग्रामों में परम शक्तिशाली इंद्र को अपनी रक्षा के लिए उसी प्रकार बुलाते हैं, जिस प्रकार कोई अपने मित्र को बुलाता है. (७)
We call the supremely powerful Indra to protect ourselves at the beginning of each yagna and in the various struggles that interfere with our yajnas in the same way as one calls his friend. (7)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 30
आ घा॑ गम॒द्यदि॒ श्रव॑त्सह॒स्रिणी॑भिरू॒तिभिः॑ । वाजे॑भि॒रुप॑ नो॒ हव॑म् ॥ (८)
इंद्र यदि हमारी पुकार सुनेंगे तो यह निश्चय है कि वे हजारों पालनशक्तियों एवं अन्नों के साथ हमारे निकट आवेगे. (८)
If Indra hears our call, it is certain that he, along with thousands of sustainers and grains, will impulse us. (8)
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