ऋग्वेद (मंडल 1)
इ॒माम॑ग्ने श॒रणिं॑ मीमृषो न इ॒ममध्वा॑नं॒ यमगा॑म दू॒रात् । आ॒पिः पि॒ता प्रम॑तिः सो॒म्यानां॒ भृमि॑रस्यृषि॒कृन्मर्त्या॑नाम् ॥ (१६)
हे अग्नि! हमने जो तुम्हारे यज्ञ का लोप किया, उस भूल को क्षमा करो. हम तुम्हारी अग्निहोत्र रूपी सेवा को छोड़कर जो दूरवर्ती मार्ग में चले आए हैं, इस भूल को भी क्षमा करो. तुम सोमयाग करने वाले मनुष्यों को सरलता से प्राप्त हो जाते हो. तुम उनके पिता के समान, परम मननशील एवं यज्ञ पूरा करने वाले हो. तुम उन्हें प्रत्यक्ष रूप से दर्शन दो. (१६)
O agni! Forgive the mistake that We have made of your yajna. Forgive this mistake, except for your service in the form of agnihotra, which has gone on the distant path. You are easily attained by the humans who do somyag. You are like their father, the most meditative and the one who completes the yajna. You let them see directly. (16)