हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.32.11

मंडल 1 → सूक्त 32 → श्लोक 11 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 32
दा॒सप॑त्नी॒रहि॑गोपा अतिष्ठ॒न्निरु॑द्धा॒ आपः॑ प॒णिने॑व॒ गावः॑ । अ॒पां बिल॒मपि॑हितं॒ यदासी॑द्वृ॒त्रं ज॑घ॒न्वाँ अप॒ तद्व॑वार ॥ (११)
जिस प्रकार पणि नामक असुर ने गायों को गुफा में बंद कर दिया था, उसी प्रकार वृत्र द्वारा रक्षित उसकी जल रूपी पत्नियां भी निरुद्ध थीं. जल बहने का मार्ग भी रुका हुआ था. इंद्र ने वृत्र को मारकर वह द्वार खोला. (११)
Just as the asura named Panai had locked the cows in the cave, so were his water-shaped wives protected by Vrithra. The way of the water flowing was also blocked. Indra killed Vritra and opened the door. (11)