हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.33.4

मंडल 1 → सूक्त 33 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 33
वधी॒र्हि दस्युं॑ ध॒निनं॑ घ॒नेन॒ँ एक॒श्चर॑न्नुपशा॒केभि॑रिन्द्र । धनो॒रधि॑ विषु॒णक्ते व्या॑य॒न्नय॑ज्वानः सन॒काः प्रेति॑मीयुः ॥ (४)
हे इंद्र! शक्तिशाली मरुदगण तुम्हारे साथ थे, फिर भी तुमने अकेले ही चोर एवं धनवान्‌ वृत्र को कठोर वञ्च द्वारा मारा. यज्ञविरोधी उसके अनुचर तुम्हें मारने के विचार से गए, पर उन्हें तुम्हारें धनुष से मृत्यु मिली. (४)
O Indra! The mighty deserts were with you, yet you alone killed the thief and the rich warrior with a stern whammy. His attendants, who resisted the sacrifice, went with the thought of killing you, but they received death from your bow. (4)