हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.35.9

मंडल 1 → सूक्त 35 → श्लोक 9 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 35
हिर॑ण्यपाणिः सवि॒ता विच॑र्षणिरु॒भे द्यावा॑पृथि॒वी अ॒न्तरी॑यते । अपामी॑वां॒ बाध॑ते॒ वेति॒ सूर्य॑म॒भि कृ॒ष्णेन॒ रज॑सा॒ द्यामृ॑णोति ॥ (९)
हाथों में सोना लिए हुए एवं विविध पदार्थो को देखते हुए सूर्य आकाश और धरती दोनों लोकों में जाते हैं. वे रोगों को दूर भगाते हैं, उदय होते हैं और अंधकार को नष्ट करने वाले प्रकाश को लेकर सारे आकाश को व्याप्त करते हैं. (९)
With gold in their hands and looking at various substances, the sun goes to both the heavens and the earth. They drive away diseases, rise and sweep the whole sky with the light that destroys darkness. (9)