ऋग्वेद (मंडल 1)
मि॒मी॒हि श्लोक॑मा॒स्ये॑ प॒र्जन्य॑ इव ततनः । गाय॑ गाय॒त्रमु॒क्थ्य॑म् ॥ (१४)
हे ऋत्विजो! अपने मुंह से स्तोत्रों की रचना करो. जिस प्रकार बादल वर्षा का विस्तार करते हैं, उसी प्रकार तुम उस स्तोत्र के श्लोकों को बढ़ाओ, तुम गायत्री छंद द्वारा निर्मित शास्त्रसम्मत स्तोत्र को पढ़ो. (१४)
Hey Ritvijo! Compose hymns with your mouth. Just as clouds extend the rain, so you increase the verses of that hymn, you read the scriptural hymns made by gayatri verses. (14)