ऋग्वेद (मंडल 1)
मो षु णः॒ परा॑परा॒ निरृ॑तिर्दु॒र्हणा॑ वधीत् । प॒दी॒ष्ट तृष्ण॑या स॒ह ॥ (६)
हे मरुद्गण! अत्यंत शक्तिशाली पाप की देवी निर्त्रति का कोई विनाश नहीं कर सकता. वह हमारा वध न करे और हमारी तृष्णा के साथ ही समाप्त हो जाए. (६)
O deserters! No one can destroy the goddess nirtrati of the most powerful sin. Let him not kill us and end with our thirst. (6)