हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.44.3

मंडल 1 → सूक्त 44 → श्लोक 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 44
अ॒द्या दू॒तं वृ॑णीमहे॒ वसु॑म॒ग्निं पु॑रुप्रि॒यम् । धू॒मके॑तुं॒ भाऋ॑जीकं॒ व्यु॑ष्टिषु य॒ज्ञाना॑मध्वर॒श्रिय॑म् ॥ (३)
हम देवताओं के दूत, निवास हेतु सबके प्रिय, धूम रूपी ध्वजा से युक्त, प्रसिद्ध प्रकाश से सुशोभित तथा प्रातःकाल यजमान के यज्ञ का सेवन करने वाले अग्नि को वरण करते हैं. (३)
We worship the messengers of the gods, everyone's beloved for abode, with a flag of fanfare, adorned with famous light and the agni that consumes the yajna of the host in the morning. (3)