हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.45.4

मंडल 1 → सूक्त 45 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 45
महि॑केरव ऊ॒तये॑ प्रि॒यमे॑धा अहूषत । राज॑न्तमध्व॒राणा॑म॒ग्निं शु॒क्रेण॑ शो॒चिषा॑ ॥ (४)
प्रौढ़कर्मा एवं प्रिय यज्ञों से सुशोभित ऋषियों ने अपनी रक्षा के लिए यज्ञ के मध्य शुद्ध प्रकाश द्वारा चमकने वाले अग्नि का आह्वान किया था. (४)
The sages adorned with the adult karma and beloved yagnas had called for a agni shining by pure light in the middle of the yajna to protect themselves. (4)