ऋग्वेद (मंडल 1)
वि या सृ॒जति॒ सम॑नं॒ व्य१॒॑र्थिनः॑ प॒दं न वे॒त्योद॑ती । वयो॒ नकि॑ष्टे पप्ति॒वांस॑ आसते॒ व्यु॑ष्टौ वाजिनीवति ॥ (६)
तुम कर्मठ पुरुष को काम में लगाती हो और भिक्षुकों को घर छोड़ने पर विवश कर देती हो. तुम ओस बरसाने वाली हो एवं अधिक देर नहीं ठहरती हो. हे अन्रसंपन्ना उषा! तुम्हारे प्रभातकाल में पक्षीगण अपने घोंसलों में नहीं रह पाते. (६)
You employ a hardworking man and force the monks to leave the house. You're about to rain dew and don't stay long. Oh, Ansampanna Usha! In your morning, the birds are not able to live in their nests. (6)