ऋग्वेद (मंडल 1)
आर्च॒न्नत्र॑ म॒रुतः॒ सस्मि॑न्ना॒जौ विश्वे॑ दे॒वासो॑ अमद॒न्ननु॑ त्वा । वृ॒त्रस्य॒ यद्भृ॑ष्टि॒मता॑ व॒धेन॒ नि त्वमि॑न्द्र॒ प्रत्या॒नं ज॒घन्थ॑ ॥ (१५)
हे इंद्र! इस युद्ध में मरुदगणों ने तुम्हारी अर्चना की थी. जिस समय तुमने तेज धार वाले वज्र से वृत्र के मुख पर चोट की, उस समय समस्त देव संग्राम में तुम्हें आनंद प्राप्त करता हुआ देखकर प्रसन्न हो रहे थे. (१५)
O Indra! In this war, the marudas worshiped you. At the time when you hit the face of the vritra with a sharp-edged thunderbolt, all the gods were happy to see you enjoying the battle. (15)