ऋग्वेद (मंडल 1)
स पर्व॑तो॒ न ध॒रुणे॒ष्वच्यु॑तः स॒हस्र॑मूति॒स्तवि॑षीषु वावृधे । इन्द्रो॒ यद्वृ॒त्रमव॑धीन्नदी॒वृत॑मु॒ब्जन्नर्णां॑सि॒ जर्हृ॑षाणो॒ अन्ध॑सा ॥ (२)
जिस समय यज्ञीय अन्न से प्रसन्न इंद्र ने जल की वर्षा करते हुए नदी के प्रवाह को रोकने वाले वृत्र का वध किया, उस समय वह धारा रूप में बहने वाले जल के बीच पर्वत के समान अचल रहा एवं उसने मनुष्यों की हजारों प्रकार से रक्षा करके पर्याप्त शक्ति प्राप्त की. (२)
At the time when Indra, pleased with sacrificial food, killed Vrithra, who stopped the flow of the river by raining water, he remained as immovable as a mountain in the midst of the stream-flowing water and gained enough strength by protecting humans in thousands of ways. (2)