हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.57.3

मंडल 1 → सूक्त 57 → श्लोक 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 57
अ॒स्मै भी॒माय॒ नम॑सा॒ सम॑ध्व॒र उषो॒ न शु॑भ्र॒ आ भ॑रा॒ पनी॑यसे । यस्य॒ धाम॒ श्रव॑से॒ नामे॑न्द्रि॒यं ज्योति॒रका॑रि ह॒रितो॒ नाय॑से ॥ (३)
हे शोभन उषा! तुम इस यज्ञ में शत्रुओं के लिए भयंकर व परमस्तुतिपात्र इंद्र के लिए इस समय यज्ञ का अन्न दो. जिस प्रकार सारथि घोड़े को इधर-उधर ले जाता है, उसी प्रकार इंद्र की सबको धारण करने वाली, प्रसिद्ध एवं पहचान कराने वाली ज्योति उन्हें यज्ञान्न प्राप्त कराने के लिए इधर-उधर ले जाती है. (३)
O Shobhan Usha! You give the grain of the yajna at this time for indra, who is fierce for the enemies and fierce for the enemies in this yajna. Just as The Charioteer takes the horse around, so does Indra's all-holding, famous and familiar light, taking them around to get the yajnan. (3)