हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.58.6

मंडल 1 → सूक्त 58 → श्लोक 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 58
द॒धुष्ट्वा॒ भृग॑वो॒ मानु॑षे॒ष्वा र॒यिं न चारुं॑ सु॒हवं॒ जने॑भ्यः । होता॑रमग्ने॒ अति॑थिं॒ वरे॑ण्यं मि॒त्रं न शेवं॑ दि॒व्याय॒ जन्म॑ने ॥ (६)
हे अग्नि! मनुष्यों के बीच में भृगु ऋषि ने दिव्य जन्म प्राप्त करने के लिए तुम्हें उसी प्रकार धारण किया था, जिस प्रकार लोग उत्तम धन को संभाल कर रखते हैं. तुम लोगों का आह्वान सरलता से सुन लेते हो एवं देवों का आह्वान करने वाले हो. तुम यज्ञस्थान में अतिथि के समान पूजनीय एवं मित्र के समान सुख देने वाले हो. (६)
O agni! In the midst of human beings, sage Bhrigu held you to attain divine birth in the same way that people handle the best wealth. You can easily listen to the call of the people and you are the ones who call upon the gods. You are revered as a guest in the yajnasthan and give as much happiness as a friend. (6)