ऋग्वेद (मंडल 1)
पि॒तुर्न पु॒त्राः क्रतुं॑ जुषन्त॒ श्रोष॒न्ये अ॑स्य॒ शासं॑ तु॒रासः॑ ॥ (९)
जिस प्रकार पुत्र पिता की आज्ञा का पालन करता है, उसी प्रकार यजमान शीघ्रतापूर्वक अग्नि की आज्ञा सुनते हैं एवं उनके आदेश के अनुसार कार्य करते हैं. विविध अन्नों के स्वामी अग्नि धन देते हैं, जो यज्ञ का साधन है. यज्ञगृह के प्रति आसक्ति रखने वाले अग्नि ने आकाश को नक्षत्रों से सुशोभित किया. (९)
Just as the son obeys the father, similarly the host listens to Agni's command quickly and acts according to his orders. Agni, The swami of various food grains gives wealth, which is the means of yajna. Agni, who was attached to the yagyagriha, adorned the sky with stars. (9)