हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.71.10

मंडल 1 → सूक्त 71 → श्लोक 10 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 71
मा नो॑ अग्ने स॒ख्या पित्र्या॑णि॒ प्र म॑र्षिष्ठा अ॒भि वि॒दुष्क॒विः सन् । नभो॒ न रू॒पं ज॑रि॒मा मि॑नाति पु॒रा तस्या॑ अ॒भिश॑स्ते॒रधी॑हि ॥ (१०)
हे अग्नि! हमारे प्रति तुम्हारी जो परंपरागत मित्रता है, उसे नष्ट मत करो, क्योंकि तुम भूत, भविष्यत्‌ एवं वर्तमान सबके ज्ञाता हो. जिस प्रकार आकाश को सूर्य की किरणें ढक लेती हैं, उसी प्रकार हमारा विनाश करने वाले बुढ़ापे को हमसे दूर रखने का प्रयत्न करो. (१०)
O agni! Don't destroy your traditional friendship with us, for you know the past, the future, and the present. Just as the sun's rays cover the sky, so try to keep away from us the old age that destroys us. (10)