हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.71.2

मंडल 1 → सूक्त 71 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 71
वी॒ळु चि॑द्दृ॒ळ्हा पि॒तरो॑ न उ॒क्थैरद्रिं॑ रुज॒न्नङ्गि॑रसो॒ रवे॑ण । च॒क्रुर्दि॒वो बृ॑ह॒तो गा॒तुम॒स्मे अहः॒ स्व॑र्विविदुः के॒तुमु॒स्राः ॥ (२)
हमारे पितर अंगिराओं ने मंत्र द्वारा अग्नि की स्तुति करके उस स्तुति शब्द द्वारा ही बलवान्‌ एवं दृढ़ पणि असुर को समाप्त किया था एवं हमारे लिए महान्‌ द्युलोक का मार्ग बनाया था. इसके पश्चात्‌ उन्होंने सुखपर्वक प्राप्य दिवस, संसार प्रकाशक सूर्य एवं पणियों द्वारा चुराई गई गायों को जाना था. (२)
Our fathers, angiras, by praising agni through mantras, had put an end to the strong and firm panai asura by that word of praise and made for us the path of the great duloka. After this, he had to go to the happy day, the world publisher sun and the cows stolen by the panies. (2)