हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.80.13

मंडल 1 → सूक्त 80 → श्लोक 13 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 80
यद्वृ॒त्रं तव॑ चा॒शनिं॒ वज्रे॑ण स॒मयो॑धयः । अहि॑मिन्द्र॒ जिघां॑सतो दि॒वि ते॑ बद्बधे॒ शवोऽर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥ (१३)
हे इंद्र! जब वृत्र ने तुम्हें मारने के लिए अशनि छोड़ी और तुमने उसे अपने वज्र से नष्ट कर दिया, उस समय तुमने अहि अर्थात्‌ वृत्र के नाश के लिए संकल्प किया और तुम्हारा बल आकाश में व्याप्त हो गया. इस प्रकार तुमने अपना प्रभुत्व प्रदर्शित किया. (१३)
O Indra! When the vritra left the ashani to kill you and you destroyed it with your thunderbolt, at that time you resolved to destroy the ahi i.e. the vritra, and your force pervaded the sky. Thus you have demonstrated your dominance. (13)