हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.83.6

मंडल 1 → सूक्त 83 → श्लोक 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 83
ब॒र्हिर्वा॒ यत्स्व॑प॒त्याय॑ वृ॒ज्यते॒ऽर्को वा॒ श्लोक॑मा॒घोष॑ते दि॒वि । ग्रावा॒ यत्र॒ वद॑ति का॒रुरु॒क्थ्य१॒॑स्तस्येदिन्द्रो॑ अभिपि॒त्वेषु॑ रण्यति ॥ (६)
शोभन फल वाले यज्ञ निमित्त जब-जब कुश काटे जाते हैं, तब-तब स्तोत्र बनाने वाला होता प्रकाशयुक्त यज्ञ में स्तोत्र बोलता है. जिस समय सोम कुचलने के काम आने वाला पत्थर स्तुतिकारी स्तोता के समान शब्द करता है, उस समय इंद्र प्रसन्न होते हैं. (६)
Whenever kushas are cut for the yajna with shobhan fruit, the maker of the psalm sits on the occasion of the light-bearing yajna and speaks the hymns in the light yajna. At the time when the stone used to crush the soma speaks like a hymn of praise, Indra is pleased. (6)