ऋग्वेद (मंडल 1)
क ई॑षते तु॒ज्यते॒ को बि॑भाय॒ को मं॑सते॒ सन्त॒मिन्द्रं॒ को अन्ति॑ । कस्तो॒काय॒ क इभा॑यो॒त रा॒येऽधि॑ ब्रवत्त॒न्वे॒३॒॑ को जना॑य ॥ (१७)
अनुग्रहकर्त्ता इंद्र के होते हुए शत्रुओं से भयभीत होकर कौन निकलता एवं शत्रुओं द्वारा नष्ट होता है? अर्थात् कोई नहीं. हमारे समीपस्थ इंद्र को रक्षक के रूप में कौन जानता है? पुत्र की, अपनी, धन की एवं शरीर की रक्षा के लिए इंद्र की प्रार्थना कौन करता है? अर्थात् प्रार्थना के बिना ही इंद्र रक्षा करते हैं. (१७)
Who comes out of fear of the enemies and is destroyed by the enemies, being a gracious Indra? i.e. none. Who knows our nearest Indra as the protector? Who prays to Indra to protect his son, himself, his wealth and the body? i.e. protect Indra without prayer. (17)