ऋग्वेद (मंडल 1)
या वः॒ शर्म॑ शशमा॒नाय॒ सन्ति॑ त्रि॒धातू॑नि दा॒शुषे॑ यच्छ॒ताधि॑ । अ॒स्मभ्यं॒ तानि॑ मरुतो॒ वि य॑न्त र॒यिं नो॑ धत्त वृषणः सु॒वीर॑म् ॥ (१२)
हे मरुद्गण! तुम अपने इष्टदाता यजमान को धरती आदि तीनों लोकों में अपने से संबंधित सुख प्रदान करो. हे कामवर्षक मरुतो! हमें पुत्रादि शोभन वीरों सहित धन दो. (१२)
O deserters! You give your godly host the happiness related to you in the three realms of the earth, etc. O workman Maruto! Give us money including the putradi shobhan heroes. (12)