ऋग्वेद (मंडल 1)
ए॒तत्त्यन्न योज॑नमचेति स॒स्वर्ह॒ यन्म॑रुतो॒ गोत॑मो वः । पश्य॒न्हिर॑ण्यचक्रा॒नयो॑दंष्ट्रान्वि॒धाव॑तो व॒राहू॑न् ॥ (५)
स्वर्णनिर्मित पहियों वाले रथों पर बैठे हुए, धारों वाले लौहचक्र से युक्त, इधर-उधर धावमान एवं शत्रुसंहारक मरुद्गणों को देखकर गौतम ऋषि ने जो स्तोत्र बोला था, वह यही है. (५)
This is the hymn that sage Gautama spoke while sitting on chariots with golden wheels, with a sharp iron circle, running around and seeing the enemy-destroying deserts. (5)