ऋग्वेद (मंडल 1)
श॒तमिन्नु श॒रदो॒ अन्ति॑ देवा॒ यत्रा॑ नश्च॒क्रा ज॒रसं॑ त॒नूना॑म् । पु॒त्रासो॒ यत्र॑ पि॒तरो॒ भव॑न्ति॒ मा नो॑ म॒ध्या री॑रिष॒तायु॒र्गन्तोः॑ ॥ (९)
हे देवो! आप लोगों ने मानवों की आयु सौ वर्ष निश्चित की है. इसी काल में आप हमारे शरीर में वृद्धावस्था उत्पन्न करते हैं. उस अवस्था में पुत्र हमारे रक्षक बन जाते हैं. हमें उस अवस्था के मध्य में नष्ट मत करना. (९)
Oh, God! You have fixed the age of human beings as hundred years. It is during this period that you produce old age in our body. In that state, the sons become our protectors. Don't destroy us in the middle of that state. (9)