ऋग्वेद (मंडल 1)
उषो॑ अ॒द्येह गो॑म॒त्यश्वा॑वति विभावरि । रे॒वद॒स्मे व्यु॑च्छ सूनृतावति ॥ (१४)
हे उषा! तुम गौ, अश्व, सत्यभाषण एवं तेज से युक्त हो. आज हमारे यज्ञ को प्रकाशित करके धन से युक्त करो. (१४)
Oh, Usha! You are full of gau, ashwa, satyabhasan and tej. Today, publish our yajna and contain wealth. (14)