हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.94.9

मंडल 1 → सूक्त 94 → श्लोक 9 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 94
व॒धैर्दुः॒शंसा॒ँ अप॑ दू॒ढ्यो॑ जहि दू॒रे वा॒ ये अन्ति॑ वा॒ के चि॑द॒त्रिणः॑ । अथा॑ य॒ज्ञाय॑ गृण॒ते सु॒गं कृ॒ध्यग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ॥ (९)
हे अग्नि! तुम हननसाधन आयुधों से अपवाद के पात्र एवं दुर्बुद्धि लोगों का वध करो. जो श्रु हमारे समीप या दूर हैं, उनका नाश करो. इस प्रकार तुम अपनी स्तुति करने वाले यजमान का मार्ग शोभन बनाओ. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों. (९)
O agni! You kill the evil-minded and the unwise people who are exceptional with the weapons of condonation. Destroy those who are near or far away from us. Thus make the way of the host praising you to adorn. Let us not be disenchanted by anyone by gaining your friendship. (9)