ऋग्वेद (मंडल 1)
क इ॒मं वो॑ नि॒ण्यमा चि॑केत व॒त्सो मा॒तॄर्ज॑नयत स्व॒धाभिः॑ । ब॒ह्वी॒नां गर्भो॑ अ॒पसा॑मु॒पस्था॑न्म॒हान्क॒विर्निश्च॑रति स्व॒धावा॑न् ॥ (४)
हे यजमानो! जल, वन आदि में गर्भरूप से स्थित अग्नि को तुम में से कोन जानता है? अर्थात् कोई नहीं. यह पुत्र होकर भी अपनी जलरूपी माताओं को हव्य द्वारा जन्म देता है. यह प्रौढ़ तेज वाला, क्रांतदर्शी एवं हवि रूप अन्न से युक्त अग्नि अनेक प्रकार के जलों को उत्पन्न करने का कारण बनकर समुद्र से सूर्य रूप में निकलता है. (४)
O hosts! Who among you knows the agni inherently in water, forest, etc. i.e. none. It, even being a son, gives birth to its water-like mothers through havan. This adult, fast-paced, and crystalline agni comes out of the sea in the form of the sun, causing the production of many types of water. (4)