हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 11
वृषा॒ वृष्णे॑ दुदुहे॒ दोह॑सा दि॒वः पयां॑सि य॒ह्वो अदि॑ते॒रदा॑भ्यः । विश्वं॒ स वे॑द॒ वरु॑णो॒ यथा॑ धि॒या स य॒ज्ञियो॑ यजतु य॒ज्ञिया॑ँ ऋ॒तून् ॥ (१)
वर्षा करने वाले, महान्‌ और अपराजेय अग्नि ने हवि बरसाने वाले यजमान के लिए दोहन क्रिया द्वारा आकाश से जल गिराया. वरुण अपनी बुद्धि से सारे संसार को जानते हैं. यज्ञयोग्य अग्नि अनुकूल ऋतुओं में यज्ञ करें. (१)
The rainy, great and unbeatable agni dropped water from the sky by tapping the host who rained. Varuna knows the whole world by his intellect. Perform yajna in favorable seasons of sacrificial agni. (1)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 11
रप॑द्गन्ध॒र्वीरप्या॑ च॒ योष॑णा न॒दस्य॑ ना॒दे परि॑ पातु मे॒ मनः॑ । इ॒ष्टस्य॒ मध्ये॒ अदि॑ति॒र्नि धा॑तु नो॒ भ्राता॑ नो ज्ये॒ष्ठः प्र॑थ॒मो वि वो॑चति ॥ (२)
अन्ने के गुणों का वर्णन करने वाली गंधर्वपत्नी एवं जलों से संस्कृत आहुति ने अग्नि को विशेष तृप्त किया है. मेरा मन स्तुतियों के उच्चारण में भली-भांति लगा रहे. खंडनरहित अग्नि हमें यज्ञ के बीच में स्थित करें. यजमानों में मुख्य अर्थात्‌ मेरे बड़े भाई अग्नि की विशेषरूप से स्तुति करें. (२)
The Sanskrit ahuti of gandharva wife and water describing the qualities of the ane has made the agni specially satiated. My mind was well engaged in the chanting of praises. Let the unbroken agni place us in the middle of the yagna. Especially praise the chief of hosts, that is, my elder brother Agni. (2)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 11
सो चि॒न्नु भ॒द्रा क्षु॒मती॒ यश॑स्वत्यु॒षा उ॑वास॒ मन॑वे॒ स्व॑र्वती । यदी॑मु॒शन्त॑मुश॒तामनु॒ क्रतु॑म॒ग्निं होता॑रं वि॒दथा॑य॒ जीज॑नन् ॥ (३)
भद्रा, शब्दयुक्त एवं अन्न वाली उषा यजमान के लिए आदित्य के साथ शीघ्र उदित हुई. उस समय यज्ञाभिलाषियों के ऊपर प्रसन्न होने वाले एवं देवों को बुलाने वाले अग्नि को उत्पन्न किया गया. (३)
Bhadra, the worded and the foody Usha quickly got up with Aditya for the host. At that time, the agni that pleased the yajnabhilasis and calling the gods was created. (3)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 11
अध॒ त्यं द्र॒प्सं वि॒भ्वं॑ विचक्ष॒णं विराभ॑रदिषि॒तः श्ये॒नो अ॑ध्व॒रे । यदी॒ विशो॑ वृ॒णते॑ द॒स्ममार्या॑ अ॒ग्निं होता॑र॒मध॒ धीर॑जायत ॥ (४)
बाज पक्षी अग्ने द्वारा प्रेरित होकर यज्ञ में महान्‌, सूक्ष्मदर्शी तथा न कम न अधिक सोम को ले आया. जब आर्य यजमान उस दर्शनीय व देवों के आहवान करने योग्य अग्नि की प्रार्थना करते हैं, तब होता यज्ञक्रिया आरंभ करते हैं. (४)
Inspired by the Baj bird Agne, he brought the great, the microscope and not less the greater Soma to the yajna. When the Aryan hosts pray for that visible and agni that is worthy of the calling of the gods, they begin the yajna kriya. (4)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 11
सदा॑सि र॒ण्वो यव॑सेव॒ पुष्य॑ते॒ होत्रा॑भिरग्ने॒ मनु॑षः स्वध्व॒रः । विप्र॑स्य वा॒ यच्छ॑शमा॒न उ॒क्थ्यं१॒॑ वाजं॑ सस॒वाँ उ॑प॒यासि॒ भूरि॑भिः ॥ (५)
हे अग्नि! तुम पशुओं को पुष्ट करने वाली घास के समान सदा रमणीय हो. तुम मनुष्यों के हव्य से शोभन यज्ञ वाले बनो. तुम स्तोता की स्तुतियों की प्रशंसा करते हुए एवं हव्य का उपभोग करते हुए बहुत से देवों के साथ जाते हो. (५)
O agni! You are always delightful like the grass that reinforces the animals. You become the ones with the adornment of the human beings. You go with many gods praising the hymns of the Stota and consuming the havya. (5)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 11
उदी॑रय पि॒तरा॑ जा॒र आ भग॒मिय॑क्षति हर्य॒तो हृ॒त्त इ॑ष्यति । विव॑क्ति॒ वह्निः॑ स्वप॒स्यते॑ म॒खस्त॑वि॒ष्यते॒ असु॑रो॒ वेप॑ते म॒ती ॥ (६)
हे अग्नि! तुम अपना प्रकाश अपने माता-पिता द्यावा-पृथिवी की ओर इस प्रकार भेजो, जिस प्रकार सूर्य अपनी ज्योति इनकी ओर भेजते हैं. यज्ञ की कामना करने वाला यजमान सच्चे मन से यज्ञ करना चाहता है एवं स्तुति वचन बोलने का इच्छुक है. अध्वर्यु यज्ञकर्म को पूरा करने को उत्सुक है. ब्रह्मा स्तोत्र को बढ़ाते हैं एवं उनकी बुद्धि यज्ञ के विषय में कभी- कभी शंका करने लगती है. (६)
O agni! Send your light to your parents, Dyava-Prithvi, just as the sun sends its light to them. The host who wishes for the yajna wants to perform the yajna with a true heart and is willing to speak the word of praise. Adhwaryu is eager to complete the yajnakarma. Brahma increases the hymn and his intellect sometimes begins to doubt about the yagna. (6)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 11
यस्ते॑ अग्ने सुम॒तिं मर्तो॒ अक्ष॒त्सह॑सः सूनो॒ अति॒ स प्र श‍ृ॑ण्वे । इषं॒ दधा॑नो॒ वह॑मानो॒ अश्वै॒रा स द्यु॒माँ अम॑वान्भूषति॒ द्यून् ॥ (७)
हे बलपुत्र अग्नि! जो मनुष्य तुम्हारी दयादृष्टि चाहता है, वह प्रसिद्ध, अन्नदाता, घोड़ों पर बैठकर चलने वाला, दीप्तिशाली, बली एवं प्रतिदिन सुशोभित होता हुआ तुम्हारी सेवा करता है. (७)
O son of strength, agni! The man who seeks your mercy, the famous, the giver of food, the one who walks on horses, the bright, the sacrifice, and the beautification of you every day, serves you. (7)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 11
यद॑ग्न ए॒षा समि॑ति॒र्भवा॑ति दे॒वी दे॒वेषु॑ यज॒ता य॑जत्र । रत्ना॑ च॒ यद्वि॒भजा॑सि स्वधावो भा॒गं नो॒ अत्र॒ वसु॑मन्तं वीतात् ॥ (८)
हे यज्ञ-योग्य अग्नि! जब हमारी स्तुतियां देवों के बीच में प्रकाशित होती हैं, उस समय तुम हमें रत्न देते हो. हे स्वधायुक्त अग्नि! उस समय हम धन का भाग प्राप्त करें. (८)
O sacrificial agni! When our praises are published among the gods, at that time you give us gems. O self-sufficient agni! At that time we get part of the money. (8)
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