ऋग्वेद (मंडल 10)
तं म॑र्ता॒ अम॑र्त्यं घृ॒तेना॒ग्निं स॑पर्यत । अदा॑भ्यं गृ॒हप॑तिम् ॥ (६)
हे मनुष्यो! घृत द्वारा मरणरहित, अपराजेय एवं गृहपति अग्नि की सेवा करो. (६)
O men! Serve the agni without death, unbeatable and homemaker by the abomination. (6)
मंडल 10 → सूक्त 118 → श्लोक 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation