ऋग्वेद (मंडल 10)
वसुं॒ न चि॒त्रम॑हसं गृणीषे वा॒मं शेव॒मति॑थिमद्विषे॒ण्यम् । स रा॑सते शु॒रुधो॑ वि॒श्वधा॑यसो॒ऽग्निर्होता॑ गृ॒हप॑तिः सु॒वीर्य॑म् ॥ (१)
मैं सूर्य के समान विचित्र तेज वाले, रमणीय, सुखकारक, अतिथि के समान पूज्य व द्वेषरहित अग्नि की स्तुति करता हूं. अग्नि विश्व धारण करने वाली तथा शोकनाशिनी गाएं एवं शोभन-वीर्य यजमानों को देते हैं. वे होता एवं गृहपति हैं. (१)
I admire the strange bright, delightful, pleasing, guest-like, deserving and hateless agni as the sun. The agni world-wearing and the mourners sing and give the semen to the hosts. They would and are homeowners. (1)