हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.132.1

मंडल 10 → सूक्त 132 → श्लोक 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 132
ई॒जा॒नमिद्द्यौर्गू॒र्ताव॑सुरीजा॒नं भूमि॑र॒भि प्र॑भू॒षणि॑ । ई॒जा॒नं दे॒वाव॒श्विना॑व॒भि सु॒म्नैर॑वर्धताम् ॥ (१)
स्वर्ग यज्ञकर्ता के लिए ही धन धारण करता है. भूमि उसीको संपत्ति वाला बनाती है. अश्विनीकुमार देवयज्ञकर्ता को ही नाना सुखसामम्री द्वारा बढ़ाते हैं. (१)
Heaven holds wealth only for the yajnakar. The land makes it a property. Ashwinikumar increases the devagyakta only through various pleasuresamri. (1)