ऋग्वेद (मंडल 10)
ए॒ता त्या ते॒ श्रुत्या॑नि॒ केव॑ला॒ यदेक॒ एक॒मकृ॑णोरय॒ज्ञम् । मा॒सां वि॒धान॑मदधा॒ अधि॒ द्यवि॒ त्वया॒ विभि॑न्नं भरति प्र॒धिं पि॒ता ॥ (६)
हे इंद्र! तुम्हारा ही यह वीरकर्म सुना जाता है कि तुमने अकेले ही यज्ञविरोधी एवं प्रमुख राक्षस को मारा. तुमने आकाश के ऊपर सूर्य के जाने का प्रबंध किया. दुलोक वृत्र द्वारा तोड़े गए रथचक्र को तुम्हारे द्वारा ही धारण करता है. (६)
O Indra! It is heard that you alone killed the anti-sacrificial and principal demon. You arranged for the sun to go over the sky. Dulok holds the rath chakra broken by the vritra through you. (6)