हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.144.4

मंडल 10 → सूक्त 144 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 144
यं सु॑प॒र्णः प॑रा॒वतः॑ श्ये॒नस्य॑ पु॒त्र आभ॑रत् । श॒तच॑क्रं॒ यो॒३॒॑ऽह्यो॑ वर्त॒निः ॥ (४)
तीव्रगति वाले श्येन के पुत्र सुपर्ण जिस सोम को दूर देश से लाए थे, वह सोम सैकड़ों कामों में उपयोगी एवं वृत्र का उत्साह बढ़ाने वाला है. (४)
The Soma whom Suparna, son of the fast-paced Sheen, was brought from a distant country, is useful in hundreds of works and will increase the enthusiasm of the vritra. (4)