हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.155.2

मंडल 10 → सूक्त 155 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 155
च॒त्तो इ॒तश्च॒त्तामुतः॒ सर्वा॑ भ्रू॒णान्या॒रुषी॑ । अ॒रा॒य्यं॑ ब्रह्मणस्पते॒ तीक्ष्ण॑श‍ृङ्गोदृ॒षन्नि॑हि ॥ (२)
जो दरिद्रता वृक्ष, लता, मानव आदि को नष्ट करने वाली है, उसे मैं इस लोक और परलोक से दूर करता हूं. हे तीक्ष्ण तेज वाले ब्रह्मणस्पति! इस दान विरोधिनी दरिद्रता को यहां से दूर करो. (२)
I remove the poverty which is going to destroy the tree, the creeper, the human being, etc., from this world and the hereafter. O Brahmanaspati with sharp speed! Remove this dan antagonistic poverty from here. (2)