ऋग्वेद (मंडल 10)
मु॒ञ्चामि॑ त्वा ह॒विषा॒ जीव॑नाय॒ कम॑ज्ञातय॒क्ष्मादु॒त रा॑जय॒क्ष्मात् । ग्राहि॑र्ज॒ग्राह॒ यदि॑ वै॒तदे॑नं॒ तस्या॑ इन्द्राग्नी॒ प्र मु॑मुक्तमेनम् ॥ (१)
हे रोगी! यज्ञसामग्री द्वारा मैं तुम्हें यक्ष्मा एवं राजयक्ष्मा रोग से छुड़ाता हूं. मैं तुम्हारे जीवन के लिए ऐसा करता हूं. इस रोगी को यदि किसी दुष्ट ग्रह ने पकड़ा हो तो इंद्र एवं अग्नि इसे उससे छुड़ावें. (१)
Oh patient! Through yajnasamgri, I deliver you from tuberculosis and rajayakshama disease. I do this for your life. If this patient is caught by an evil planet, then Indra and Agni should rescue him from him. (1)
ऋग्वेद (मंडल 10)
यदि॑ क्षि॒तायु॒र्यदि॑ वा॒ परे॑तो॒ यदि॑ मृ॒त्योर॑न्ति॒कं नी॑त ए॒व । तमा ह॑रामि॒ निरृ॑तेरु॒पस्था॒दस्पा॑र्षमेनं श॒तशा॑रदाय ॥ (२)
यदि इस रोगी की आयु समाप्त हो चुकी है, यह इस लोक से गया हुआ सा है अथवा यह मृत्यु के समीप पहुंच चुका है, तब भी मैं मृत्यु की देवता निर्त्रति के पास से इसे लौटा सकता हूं. मैंने सौ वर्ष जीने के लिए इसको छुआ है. (२)
If this patient's age is over, it is a bit lost from this world, or it has come near death, yet I can still return it from nirtrati, the god of death. I've touched it to live a hundred years. (2)
ऋग्वेद (मंडल 10)
स॒ह॒स्रा॒क्षेण॑ श॒तशा॑रदेन श॒तायु॑षा ह॒विषाहा॑र्षमेनम् । श॒तं यथे॒मं श॒रदो॒ नया॒तीन्द्रो॒ विश्व॑स्य दुरि॒तस्य॑ पा॒रम् ॥ (३)
मैंने हजार आंखों वाले, सौ वर्ष वाले एवं सौ वर्ष की आयु वाले यज्ञ से इसका रोग नष्ट किया है. इंद्र इस रोगी को सौ वर्ष तक सभी पापों के पार ले जावें. (३)
I have destroyed its disease with a yagna of a thousand eyes, a hundred years of age and a hundred years of age. May Indra take this patient beyond all sins for a hundred years. (3)
ऋग्वेद (मंडल 10)
श॒तं जी॑व श॒रदो॒ वर्ध॑मानः श॒तं हे॑म॒न्ताञ्छ॒तमु॑ वस॒न्तान् । श॒तमि॑न्द्रा॒ग्नी स॑वि॒ता बृह॒स्पतिः॑ श॒तायु॑षा ह॒विषे॒मं पुन॑र्दुः ॥ (४)
हे रोगविमुक्त व्यक्ति! तुम सुखपूर्वक सौ शरद, सौ वसंत एवं सौ हेमंत ऋतु.ओं तक वृद्धि पाकर जीवित रहो. इंद्र, अग्नि, सविता और बृहस्पति यज्ञ से प्रसन्न होकर इसके लिए सौ वर्ष की आयु दें. (४)
O disease-free person! May you live happily by growing up to the hundred autumns, the hundred springs and the hundred thousand seasons. Indra, Agni, Savita and Jupiter, pleased with the yajna, give the age of 100 years for it. (4)
ऋग्वेद (मंडल 10)
आहा॑र्षं॒ त्वावि॑दं त्वा॒ पुन॒रागाः॑ पुनर्नव । सर्वा॑ङ्ग॒ सर्वं॑ ते॒ चक्षुः॒ सर्व॒मायु॑श्च तेऽविदम् ॥ (५)
हे रोगी! तुम्हें मैं मृत्यु के मुख से पुनः वापस ले आया हूं. तुम नवीन अंगों वाले हो. तुम मेरे समीप आओ. मैंने तुम्हारे लिए सभी अंगों, नेत्रों और पूर्ण आयु को प्राप्त किया है. (५)
Oh patient! I have brought you back from the mouth of death. You're the ones with new limbs. You come near to me. I have achieved for you all the organs, eyes and full age. (5)