हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 183
अप॑श्यं त्वा॒ मन॑सा॒ चेकि॑तानं॒ तप॑सो जा॒तं तप॑सो॒ विभू॑तम् । इ॒ह प्र॒जामि॒ह र॒यिं ररा॑णः॒ प्र जा॑यस्व प्र॒जया॑ पुत्रकाम ॥ (१)
हे कमों के ज्ञानी, तप से उत्पन्न एवं तपस्या से उन्नत यजमान! मैंने अपने मन की आंखों से तुम्हें देखा है. तुम यहां संतान एवं धन पाकर प्रसन्न बनो एवं पुत्र की कामना से संतान के रूप में जन्म लो. (१)
O wise host of the few, born of penance and advanced from penance! I've seen you with my mind's eye. Be happy to have children and wealth here and be born as a child by the wish of the son. (1)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 183
अप॑श्यं त्वा॒ मन॑सा॒ दीध्या॑नां॒ स्वायां॑ त॒नू ऋत्व्ये॒ नाध॑मानाम् । उप॒ मामु॒च्चा यु॑व॒तिर्ब॑भूयाः॒ प्र जा॑यस्व प्र॒जया॑ पुत्रकामे ॥ (२)
हे पत्नी! मैंने मन की आंखों से तुम्हें दीप्तिशालिनी व ऋतु के अनुसार अपने शरीर में गर्भाधान की कामना करती हुई देखा है. हे पुत्र की कामना करने वाली! मेरे समीप तुम उत्तम तरुणी बनो एवं पुत्र उत्पन्न करो. (२)
Oh, wife! I have seen with the eyes of the mind wishing you to conceive in your body according to The Deepthishali and Ritu. O wishing for the son! Be the best young woman near me and have sons. (2)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 183
अ॒हं गर्भ॑मदधा॒मोष॑धीष्व॒हं विश्वे॑षु॒ भुव॑नेष्व॒न्तः । अ॒हं प्र॒जा अ॑जनयं पृथि॒व्याम॒हं जनि॑भ्यो अप॒रीषु॑ पु॒त्रान् ॥ (३)
मैं होता हूं, ओषधियों में गर्भ धारण करता हूं एवं सभी प्राणियों में गर्भ धारण का कारण बनता हूं. मैंने धरती पर प्रजा को जन्म दिया है. मैं यज्ञ करके सब नारियों में पुत्र उत्पन्न कर सकता हूं. (३)
I am, conceive in medicines and cause conception in all beings. I gave birth to people on earth. I can produce a son among all women by performing yajna. (3)