हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 189
आयं गौः पृश्नि॑रक्रमी॒दस॑दन्मा॒तरं॑ पु॒रः । पि॒तरं॑ च प्र॒यन्स्वः॑ ॥ (१)
गमनशील व तेज प्राप्त करने वाले सूर्य उदयाचल को पाकर अपनी माता पूर्व दिशा को प्राप्त करते हैं. वे इसके बाद अपने पिता आकाश के पास जाते हैं. (१)
The moving and fast-receiving sun attains the east direction by getting udayachal. They then go to their father Akash. (1)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 189
अ॒न्तश्च॑रति रोच॒नास्य प्रा॒णाद॑पान॒ती । व्य॑ख्यन्महि॒षो दिव॑म् ॥ (२)
इस सूर्य के भीतर दीप्ति विचरण करती है एवं इनके प्राण के साथ ऊपर-नीचे जाती है सूर्य महान्‌ बनकर आकाश को व्याप्त करते हैं (२)
Within this sun, the light moves up and down and with its life, the sun becomes great and pervades the sky (2)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 189
त्रिं॒शद्धाम॒ वि रा॑जति॒ वाक्प॑तं॒गाय॑ धीयते । प्रति॒ वस्तो॒रह॒ द्युभिः॑ ॥ (३)
सूर्य के तीस स्थान शोभा पाते हैं एवं गतिशील सूर्य के लिए स्तुति की जाती है. सूर्य प्रतिदिन अपनी किरणों से शोभा पाते हैं (३)
The thirty places of the sun are adorned and praise is given to the moving sun. The sun is adorned with its rays every day (3)