हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.23.4

मंडल 10 → सूक्त 23 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 23
सो चि॒न्नु वृ॒ष्टिर्यू॒थ्या॒३॒॑ स्वा सचा॒ँ इन्द्रः॒ श्मश्रू॑णि॒ हरि॑ता॒भि प्रु॑ष्णुते । अव॑ वेति सु॒क्षयं॑ सु॒ते मधूदिद्धू॑नोति॒ वातो॒ यथा॒ वन॑म् ॥ (४)
विशाल वर्षा जिस प्रकार पशुसमूह को भिगोती है, उसी प्रकार इंद्र हरे रंग के सोम से अपनी दाढ़ी भिगोते हैं. इसके बाद इंद्र शोभन यज्ञशाला में जाते हैं और वहां निचुड़े हुए सोमरस को पीकर अपनी दाढ़ी को इस प्रकार हिलाते हैं जिस प्रकार वायु वनों को हिलाते हैं (४)
Just as the huge rain soaks the animal group, Indra soaks his beard with a green soma. Indra Then Goes to Shobhan Yajnashala and drinks the stagnated somras there and shakes his beard in such a way that the air shakes the forests (4)