हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.31.4

मंडल 10 → सूक्त 31 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 31
नित्य॑श्चाकन्या॒त्स्वप॑ति॒र्दमू॑ना॒ यस्मा॑ उ दे॒वः स॑वि॒ता ज॒जान॑ । भगो॑ वा॒ गोभि॑रर्य॒मेम॑नज्या॒त्सो अ॑स्मै॒ चारु॑श्छदयदु॒त स्या॑त् ॥ (४)
अपनी प्रजाओं के स्वामी प्रजापति दानोत्सुक होकर फल देने की अभिलाषा करें. यज्ञकर्ता को सविता देव ने फल दिया है. स्तुति द्वारा प्रसन्न इंद्र एवं अर्यमा मुझे फल दें. सुंदर रूप वाले सभी देव मुझे फल दें. (४)
The lord of your people, Prajapati, wish to give fruit by being a danotsuk. The yajnakar has been given fruit by Savita Dev. May Indra and Aryama, pleased with praise, give me fruit. All the gods with beautiful appearance give me fruit. (4)