ऋग्वेद (मंडल 10)
ए॒तं वां॒ स्तोम॑मश्विनावक॒र्मात॑क्षाम॒ भृग॑वो॒ न रथ॑म् । न्य॑मृक्षाम॒ योष॑णां॒ न मर्ये॒ नित्यं॒ न सू॒नुं तन॑यं॒ दधा॑नाः ॥ (१४)
हे अश्विनीकुमारो! भृगुवंशियों ने जिस प्रकार रथ बनाया, उसी प्रकार हमने तुम्हारे लिए यह स्तोत्र बनाया है. जिस प्रकार दामाद को देने के लिए कन्या का शृंगार किया जाता है, उसी प्रकार हमने यह रथ सजाया है. हम इस स्तोत्र को यज्ञकर्ता पुत्र के समान सदा धारण करते हैं. (१४)
O Ashwinikumaro! Just as the Bhriguvanshis made the chariot, we have made this hymn for you. Just as the kanya is adorned to give to the son-in-law, in the same way we have decorated this chariot. We hold this hymn as the sacrificial son forever. (14)