हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.40.13

मंडल 10 → सूक्त 40 → श्लोक 13 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 40
ता म॑न्दसा॒ना मनु॑षो दुरो॒ण आ ध॒त्तं र॒यिं स॒हवी॑रं वच॒स्यवे॑ । कृ॒तं ती॒र्थं सु॑प्रपा॒णं शु॑भस्पती स्था॒णुं प॑थे॒ष्ठामप॑ दुर्म॒तिं ह॑तम् ॥ (१३)
हे प्रसन्न होते हुए अश्विनीकुमारो! मैं तुम्हारी स्तुति की अभिलाषा करती हूं. तुम मेरे पति के घर में पुत्रादियुक्त धन स्थापित करो. हे जल के स्वामी अश्विनीकुमारो! जब मैं पति के घर जाऊं तब तुम पानी के घाटों का जल पीने योग्य बनाओ. मेरे मार्ग में यदि कोई सूखा हुआ वृक्ष या दुष्ट बुद्धि वाला व्यक्ति हो, तुम उसे भी हटाओ. (१३)
O happy Ashwinikumaro! I long for your praise. You set up the son-in-law's wealth in my husband's house. O Lord of water Ashwinikumaro! When I go to my husband's house, you make the water of the water ghats drinkable. If there is a dried-up tree or a man of evil intellect in My way, remove him also. (13)