हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.45.7

मंडल 10 → सूक्त 45 → श्लोक 7 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 45
उ॒शिक्पा॑व॒को अ॑र॒तिः सु॑मे॒धा मर्ते॑ष्व॒ग्निर॒मृतो॒ नि धा॑यि । इय॑र्ति धू॒मम॑रु॒षं भरि॑भ्र॒दुच्छु॒क्रेण॑ शो॒चिषा॒ द्यामिन॑क्षन् ॥ (७)
हवि चाटने वाले, समस्त लोकों को शुद्ध करने वाले, सब ओर गतिशील, शोभन प्रज्ञा वाले व मरणरहित अग्नि मरणधर्मा मानवों में रहते हैं. अग्नि धूम को प्रेरित करते हैं एवं तेजस्वी रूप धारण करते हुए, उज्ज्वल किरणों से स्वर्ग को व्याप्त करते हैं. (७)
Those who lick, purify all the realms, are dynamic everywhere, those with a good sense of mind and without death, live in human beings. Fire inspires smoke and pervades heaven with bright rays, taking a stunning form. (7)