हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.46.2

मंडल 10 → सूक्त 46 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 46
इ॒मं वि॒धन्तो॑ अ॒पां स॒धस्थे॑ प॒शुं न न॒ष्टं प॒दैरनु॑ ग्मन् । गुहा॒ चत॑न्तमु॒शिजो॒ नमो॑भिरि॒च्छन्तो॒ धीरा॒ भृग॑वोऽविन्दन् ॥ (२)
लोग जिस प्रकार पैरों के निशान देखकर चुराए हुए पशुओं का पीछा करते हैं, उसी प्रकार तुम्हारी सेवा करने वाले ऋषियों ने जलों के बीच तुम्हें ढूंढ़ा. तुम्हारी कामना करने वाले एवं बुद्धिमान्‌ भृगुवंशी ऋषियों ने एकांत में छिपे हुए अग्नि को स्तुतियों द्वारा प्राप्त किया. (२)
Just as people chase stolen animals when they see footprints, so the sages who serve you looked for you among the waters. The wise sages who wished you and the wise bhriguvanshi received the agni hidden in solitude through praises. (2)