हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.46.8

मंडल 10 → सूक्त 46 → श्लोक 8 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 46
प्र जि॒ह्वया॑ भरते॒ वेपो॑ अ॒ग्निः प्र व॒युना॑नि॒ चेत॑सा पृथि॒व्याः । तमा॒यवः॑ शु॒चय॑न्तं पाव॒कं म॒न्द्रं होता॑रं दधिरे॒ यजि॑ष्ठम् ॥ (८)
अग्नि अपनी ज्वाला के द्वारा यज्ञकर्म को धारण करते हैं एवं धरती की रक्षा के लिए अनुग्रहपूर्वक स्तुतियां स्वीकार करते हैं. गतिशील मनुष्य दीप्तिशाली, शुद्ध करने वाले, स्तुतियोग्य, होमनिष्पादक एवं अतिशय यज्ञपात्र अग्नि को धारण करते हैं. (८)
The agni, through its flame, holds the yagnakarma and graciously accepts praises to protect the earth. Dynamic human beings possess the glorious, purifying, praiseworthy, home-grown and very sacrificial agni. (8)