हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.47.4

मंडल 10 → सूक्त 47 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 47
स॒नद्वा॑जं॒ विप्र॑वीरं॒ तरु॑त्रं धन॒स्पृतं॑ शूशु॒वांसं॑ सु॒दक्ष॑म् । द॒स्यु॒हनं॑ पू॒र्भिद॑मिन्द्र स॒त्यम॒स्मभ्यं॑ चि॒त्रं वृष॑णं र॒यिं दाः॑ ॥ (४)
हे इंद्र! तुम हमें अन्न प्राप्त करने वाला, मेधावी, तारने वाला, धनपूर्ण करने वाला, वृद्धियु्त, शोभनबल वाला, शत्रुहंता, शत्रु नगरियों को तोड़ने वाला एवं सच्चे कमो वाला पुत्र दो. तुम हमें वर्षक एवं विचित्र धन दो. (४)
O Indra! You give us a son of food, of the bright, the one who fights, the rich, the rich, the one who is prosperous, the one who is a bewilder, the one who breaks the enemy cities and the true kamo. You give us annual and strange money. (4)