हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.48.3

मंडल 10 → सूक्त 48 → श्लोक 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 48
मह्यं॒ त्वष्टा॒ वज्र॑मतक्षदाय॒सं मयि॑ दे॒वासो॑ऽवृज॒न्नपि॒ क्रतु॑म् । ममानी॑कं॒ सूर्य॑स्येव दु॒ष्टरं॒ मामार्य॑न्ति कृ॒तेन॒ कर्त्वे॑न च ॥ (३)
त्वष्टा ने मेरे लिए लोहे का वज्र बनाया था. देवगण मेरे लिए यज्ञ पूरा करते हैं. मेरी सेवा सूर्य के समान दुस्तर है. लोग मेरे द्वारा भूतकाल में किए गए एवं भविष्य में किए जाने वाले कार्यो के कारण मेरे पास आते हैं. (३)
Taksha had made an iron vajra for me. The gods complete the yajna for me. My service is as fast as the sun. People come to Me because of the work I have done in the past and what I do in the future. (3)